Breaking
Thu. Jul 9th, 2026

अधिकारी से बढ़कर समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज थे पूर्व आईएएस चंद्र सिंह

अस्सी गंगा घाटी के सपूत की देहरादून में निधन से उत्तरकाशी में शोक

गांधीवादी और सर्वोदय विचारधारा से  रहा गहरा  जुड़ाव

चिरंजीव सेमवाल

उत्तरकाशी। सीमांत उत्तरकाशी की अस्सी गंगा घाटी ने बुधवार देर रात अपना एक ऐसा सपूत खो दिया, जिसने प्रशासनिक सेवा को सत्ता का नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और अधिकार पहुंचाने का माध्यम बनाया।  उत्तरकाशी के पहले पीसीएस और फिर आईएएस बनने वाले चंद्र सिंह जी का 84 वर्ष की उम्र में निधन हुआ। उनके
निधन की खबर से पूरे जनपद में शोक की लहर दौड़ गई।
जनपद के अति दुर्गम गाँव भंकोली केलसु में एक गरीब अनुसूचित जाति परिवार में 15 अगस्त 1942 को जन्में चंद्रसिंह जी ने 1959 में हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात सुन्दर लाल बहुगुणा जी उन्हें टिहरी ले आए तथा प्रताप इंटर कॉलेज में 11 वीं में प्रवेश दिलाया और ठक्कर बापा छात्रावास में रहने की व्यवस्था कर दी। तब से सर्वोदय और गांधी विचार का उनके जीवन पर असर रहा। 1961 में टिहरी से इंटरमीडिएट करने के बाद उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा के लिए भेज दिया गया। 1967 में वे पीसीएस बन गए। फिर 1985 में उत्तर प्रदेश कैडर में ही आईएएस हो गए थे।
भारतीय प्रशासनिक सेवा के शीर्ष पदों तक पहुंचे आईएएस चंद्र सिंह , लेकिन उनकी पहचान कभी पद और प्रोटोकॉल तक सीमित नहीं रही। वे अपनी सादगी, ईमानदारी और जनसरोकारों के लिए जाने जाते थे। प्रशासनिक गलियारों में उनकी छवि ऐसे अधिकारी की रही, जो फाइलों से ज्यादा लोगों की समस्याओं को महत्व देता था।
अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया और जिलाधिकारी, परियोजना निदेशक, विशेष सचिव, संयुक्त विकास आयुक्त तथा विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए प्रशासन को जन आकांक्षाओं से जोड़ने का प्रयास किया। राज्य गठन के बाद वे लोक निर्माण विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद से 31 अगस्त 2002 को सेवानिवृत्त हुए।
नदी बचाओ अभियान से जुड़े वरिष्ठ गांधीवादी कार्यकर्ता सुरेश भाई बताते हैं कि चंद्र सिंह ने सरकारी संसाधनों का न्यूनतम उपयोग करते हुए जनता की अधिकतम सेवा को अपना लक्ष्य बनाया। प्रशासनिक ईमानदारी और पारदर्शिता उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान थी।
उनका जीवन केवल प्रशासनिक सेवा तक सीमित नहीं था। वे गांधीवादी और सर्वोदय विचारधारा से गहराई से जुड़े रहे। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा उनके प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक रहे। टिहरी स्थित ठक्कर बापा छात्रावास में शिक्षा के दौरान उन्हें सामाजिक चेतना और जनसेवा के संस्कार मिले। वहीं उनके साथ पूर्व पर्वतीय विकास मंत्री बर्फियालाल जुंवाठा और समाज सुधारक बिहारी लाल भी अध्ययनरत रहे।
करीब-करीब भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में जन्मे चंद्र सिंह ने स्वतंत्र भारत के निर्माण और समाज में समानता, सद्भाव तथा जनहित की भावना को मजबूत करने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। वे प्रशासनिक अधिकारी भर नहीं थे, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज थे।
उनके निधन पर जिला पंचायत अध्यक्ष रमेश चौहान, भाजपा जिलाध्यक्ष नागेंद्र सिंह चौहान, मुख्यमंत्री के गढ़वाल समन्वयक किशोर भट्ट, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष दीपक बिजल्वाण, पूर्व विधायक विजयपाल सिंह सजवाण, भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष वैखुलाल एडवोकेट मदन मोहन बिजल्वाण, कांग्रेस नेता मनीष राणा, सुरेंद्र सिंह पंवार और मनीष रावत सहित अनेक जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने गहरा शोक व्यक्त किया।

 

 

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!